जानिये कैसे सोशल मीडिया कर रहा है आपको बीमार और उड़ा रहा है आपकी नींद

जानिये कैसे सोशल मीडिया कर रहा है आपको बीमार और उड़ा रहा है आपकी नींद

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जानिये कैसे सोशल मीडिया कर रहा है आपको बीमार और उड़ा रहा है आपकी नींद

सोशल मीडिया (social media) आज के दौर में बेहद ताक़तवर माध्यम बन गया है. लोग खुलकर (openly) इज़हार-ए-ख़याल कर रहे हैं.

दुनिया (world) को बता रहे हैं कि वो क्या कर रहे हैं. कब कहां हैं. किस चीज़ का लुत्फ़ (enjoy) उठा रहे हैं. किस बात से उन्हें परेशानी हो रही है.

मगर सोशल मीडिया (social media) के हद से ज़्यादा इस्तेमाल से मुश्किलें भी खड़ी होने लगी हैं. चूंकि ये संवाद का नया माध्यम (medium) है, इसलिए इस बारे मे ठोस रिसर्च (research) कम है और हौव्वा ज़्यादा.

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आज लोग सोशल मीडिया (social media) की लत पड़ने की बातें करते हैं.

क्या होता है सोशल मीडिया (social media) के ज़्यादा इस्तेमाल से?

सवाल ये है कि सोशल मीडिया (social media) पर कितना वक़्त बिताना ठीक है? और किस हद के पार जाना इसकी लत (habit) पड़ने में शुमार होता है?

यूं तो सोशल मीडिया (social media) की लत को लेकर कुछ रिसर्च होनी शुरु हुई हैं, मगर अभी इनसे भी किसी ठोस नतीजे (strong result) पर नहीं पहुंचा जा सका है.

हां, अब तक सोशल मीडिया (social media) के इस्तेमाल पर जो तजुर्बे हुए हैं, उनसे एक बात तो सामने साफ़ तौर पर आई है. वो ये कि बहुत ज़्यादा सोशल मीडिया (social media) इस्तेमाल करने वाले दिमागी बीमारियों (mental diseases) के शिकार हो रहे हैं. डिप्रेशन और नींद (sleep) न आने की समस्या से जूझ रहे हैं.

किसी चीज़ की लत (habit) पड़ना सिर्फ़ उसमें ज़रूरत से ज़्यादा दिलचस्पी को नहीं दर्शाती है. बल्कि लत (habit) पड़ने का मतलब ये है कि लोग उस चीज़ पर अपनी मानसिक और जज़्बाती (mental and emotional) ज़रूरतों के लिए भी निर्भर हो गए हैं.

वो अपनी असली दुनिया (real world) के रिश्तों की अनदेखी करने लगते हैं. फिर काम और बाक़ी ज़िंदगी (life) के बीच जो तालमेल होना चाहिए, वो भी गड़बड़ाने लगता है.

ये ठीक उसी तरह है जैसे लोगों को शराब या ड्रग्स (alcohol and drugs) की लत लग जाती है. ज़रा सी परेशानी हुई नहीं कि शराब के आगोश में चले गए, या सिगरेट (cigarette) जला ली.

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सोशल मीडिया कैसे कर रहा है आपकी नींद हराम?

नींद की समस्या बढ़ती है | Increase in Sleeping Problems

एक तजुर्बे से पाया है कि अगर कोई शख़्स (person) दो घंटे या इससे ज़्यादा वक़्त सोशल मीडिया (social media) पर गुज़ारता है, तो आगे चलकर वो डिप्रेशन का शिकार हो जाता है, जज़्बाती तौर पर अकेलापन महसूस (feeling alone) करता है.

सोशल मीडिया (social media) पर हमेशा डटे रहने की वजह से हमारी सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है. देर रात तक ट्विटर (twitter) या फ़ेसबुक देखते रहने से हमारी नींद (sleep) पर बहुत बुरा असर पड़ता है.

मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन (screen) से निकलने वाली नीली रौशनी हमारे शरीर की बॉडी क्लॉक को कंट्रोल करने वाले हारमोन मेलाटोनिन का रिसाव रोकती है. मेलाटोनिन हमें नींद (sleep) आने का एहसास कराता है. मगर इसका रिसाव रुक जाने की वजह से हम देर तक जागते रहते हैं. नींद (sleep) ठीक से नहीं ली, तो यक़ीनन दूसरी परेशानियां होने लगती हैं.

लंदन के हॉस्पिटल के डॉक्टर टियक कहते हैं कि अगर बेडरूम (bedroom) में मोबाइल या लैपटॉप है, तो आम तौर पर लोग उसका इस्तेमाल करते हैं. नतीजा ये होता है कि वो अपनी नींद (sleep) से समझौता करते हैं. इससे ख़ास तौर से युवाओं (youngsters) को नई चीज़ें सीखने में मुश्किलें आती हैं.

कौन करते हैं सोशल मीडिया का ज़्यादा इस्तेमाल? | Who Using More Social Media

एक रिसर्च के मुताबिक़, ज़्यादातर युवा, महिलाएं या अकेले लोग ही सोशल मीडिया (social media) का इस्तेमाल करते हैं. सोशल मीडिया (social media) के ज़्यादा इस्तेमाल की वजहें कम तालीम, कम आमदनी और खुद पर भरोसे की कमी होना भी होती हैं. आत्ममुग्ध लोग भी सोशल मीडिया (social media) का बहुत इस्तेमाल करते हैं.

लोग सोशल मीडिया (social media) पर जाते हैं ताकि अपना ख़राब मूड ठीक कर सकें. मगर, रिसर्च बताती हैं कि सोशल मीडिया (social media) पर जाकर भी इससे आपको राहत नहीं मिलती.

मनोवैज्ञानिक डॉक्टर गोल्डिन कहते हैं कि वर्चुअल दुनिया (virtual world) में वो लोग दोस्त बनाने जाते हैं, जो असल ज़िंदगी (real life) में बहुत अकेले होते हैं.

वर्चुअल दोस्त काम के हो सकते हैं. मगर ये असली दोस्तों (friends) के विकल्प नहीं हो सकते. इसलिए डॉक्टर गोल्डिन सलाह (suggestion) देते हैं कि लोगों को घर से बाहर निकलकर, असल दुनिया (world) में लोगों से मिलना और बात करनी चाहिए.

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डिप्रेशन की वजह बना सोशल मीडिया | Depression is a reason of Social Media

पूर्वी यूरोपीय देश हंगरी में सोशल मीडिया (social media) एडिक्शन स्केल नाम का पैमाना इजाद किया गया है. इसके ज़रिए पता लगाते हैं कि किसे सोशल मीडिया (social media) की कितनी लत है.

इस स्केल की मदद (help) से पता चला कि हंगरी के 4.5 फ़ीसद लोगों को सोशल मीडिया (social media) की लत पड़ गई है. ऐसे लोगों के अंदर खुद पर भरोसे की कमी साफ दिखी. वो डिप्रेशन के भी शिकार (victim of depression) हो चुके हैं. इन लोगों को सलाह (suggestion) दी गई कि वो स्कूल-कॉलेज में सोशल मीडिया (social media) डिएडिक्सन क्लास में जाएं और ख़ुद का इलाज कराएं.

हंगरी में हुई ये रिसर्च (research) हमें आगाह करने के लिए काफ़ी है. सोशल मीडिया (social media) का सही इस्तेमाल करने की सलाहियत सभी लोगों में नहीं होती. हमें इसके इस्तेमाल को लेकर ख़ुद पर कुछ बंदिशें (limitations) आयद करनी होंगी.

वरना हम में से कई लोगों के हंगरी (hungry) के उन 4.5 फ़ीसद लोगों में शामिल होने का डर है, जो सोशल मीडिया (social media) की लत के शिकार हैं. बीमार हैं.

सोशल मीडिया (social media) का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल हमें बीमार, बहुत बीमार (sick) बना सकता है.

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